भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का राष्ट्रीय आरोग्य मेला - 2026 के शुभारंभ के अवसर पर सम्बोधन(HINDI)
शेगांव, बुलढाणा : 25.02.2026
(133.98 KB)संत गजानन महाराज की पवित्र धरती शेगांव में आप सब के बीच उपस्थित होकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता हो रही है। इस कार्यक्रम में आने से पहले मुझे उनकी प्रतिमा के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। श्री गजानन महाराज जी ने अपना सम्पूर्ण जीवन जन-कल्याण के लिए समर्पित किया था। उनका मंत्र ‘गण गण गणात बोते’ सभी जीवों को समान भाव से देखने की शिक्षा देता है। उनकी यह शिक्षा चिरंतन सत्य है। मैं उस महान संत की स्मृति में सादर नमन करती हूं।
भारतीय अध्यात्म की इस महत्वपूर्ण भूमि से, लोगों के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए आयोजित किए जा रहे "राष्ट्रीय आरोग्य मेला 2026" का शुभारंभ करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। मुझे बताया गया है कि इस चार-दिवसीय आयोजन के दौरान आयुष चिकित्सा पद्धतियों के विभिन्न आयामों पर विचार-विमर्श किया जाएगा। आयुष के प्रति लोगों की जागरूकता बढ़ाने के लिए परामर्श शिविरों और औषधि-प्रदर्शनियों का आयोजन किया जा रहा है। ऐसे आयोजनों की विशेषज्ञों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों और जन-सामान्य के बीच संवाद एवं सहभागिता स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका है। मुझे विश्वास है कि यह मेला, आयुष की समग्र दृष्टि को जन- जन तक पहुंचाने का एक सशक्त माध्यम बनेगा। मैं इस आयोजन से जुड़े आयुष मंत्रालय, महाराष्ट्र सरकार और अन्य सभी भागीदारों की सराहना करती हूं।
देवियो और सज्जनो,
हमारी परंपरा में कहा गया है ‘आरोग्यं परमं सुखम्’ अर्थात आरोग्य यानि समग्र स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा सुख है। शरीर ही समस्त कर्तव्यों को पूरा करने का प्रथम साधन है। देश को सशक्त बनाने में स्वस्थ नागरिकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। देशवासियों को स्वस्थ्य रखने में आयुष चिकित्सा पद्धतियों ने अमूल्य योगदान दिया है। योग, आयुर्वेद और सिद्ध जैसी प्रणालियां उस समय से लोगों की सेवा करती आ रही हैं जब आधुनिक चिकित्सा पद्धति का प्रचलन नहीं था।
हमारे खेतों में, हमारी रसोई में और हमारे वन-क्षेत्र में औषधीय वनस्पतियों, स्वास्थ्य-रक्षक जड़ी-बूटियों का बहुमूल्य भंडार मौजूद है। इस बहुमूल्य सम्पदा का संरक्षण और संवर्धन औषधियों के लिए raw material उपलब्ध कराने के साथ-साथ पर्यावरण संतुलन के लिए भी महत्वपूर्ण है। औषधीय पौधों की खेती न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारती है, बल्कि यह मिट्टी के स्वास्थ्य और संरक्षण में भी मदद करती है। इसलिए आयुष पद्धतियों को बढ़ावा देने से न केवल लोगों का शारीरिक और आर्थिक स्वास्थ्य बेहतर होता है बल्कि पर्यावरण संरक्षण को भी बल मिलता है।
देवियो और सज्जनो,
आज, पूरे विश्व में यह धारणा स्वीकृत हो रही है कि मनुष्य के पूर्ण स्वस्थ होने के लिए उसके मन और शरीर दोनों का स्वस्थ होना आवश्यक है। आयुर्वेद, योग और अन्य आयुष पद्धतियां हमें स्वस्थ और संतुलित जीवन जीने का मार्ग दिखाती हैं। आयुर्वेद में आहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या और बीमारियों की रोकथाम के वैज्ञानिक नियम दिए गए हैं। यह पद्धति केवल बीमारियों के उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि समग्र स्वास्थ्य प्रबंधन का विज्ञान है। योग में शरीर और मन को स्वस्थ रखने के लिए आसन, प्राणायाम और ध्यान पर बल दिया जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा, प्रकृति में उपलब्ध तत्वों से उपचार करने और स्वस्थ रहने का उपाय बताती है। सिद्ध प्रणाली समग्र दृष्टिकोण के साथ स्वास्थ्य की देखभाल की प्रणाली प्रदान करती है। सोवा-रिग्पा हिमालय के क्षेत्रों की लोकप्रिय पारंपरिक चिकित्सा पद्धति है। यूनानी और होम्योपैथी चिकित्सा पद्धतियों का उद्गम यद्यपि भारत में नहीं हुआ था लेकिन ये आज आयुष चिकित्सा प्रणाली के अभिन्न अंग के रूप में देशवासियों को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यूनानी का प्रयोग उसके उद्गम के देशों में नहीं के बराबर रह गया है, जबकि भारत में यह व्यापक स्तर पर उपयोग में लाया जा रहा है।
यह सर्वमान्य तथ्य है कि Prevention is better than cure की नीति सबसे प्रभावी नीति होती है। बीमारी से बचाव न केवल व्यक्ति के लिए लाभदायक होता है बल्कि देश की स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था पर बोझ भी कम करता है। यही कारण है कि आजकल preventive steps जैसे नियमित व्यायाम, उचित खान-पान और संतुलित जीवन-शैली पर बल दिया जा रहा है। बीमारियों की रोक-थाम में समेकित चिकित्सा पद्धति का महत्व आज पूरा विश्व समझ रहा है। तनावमुक्त और स्वस्थ जीवन शैली के लिए विश्वभर में लोग योग को अपना रहे हैं। आयुर्वेदिक उपचार और दवाओं का लाभ दुनिया भर में लोग उठा रहे हैं।
आयुष चिकित्सा पद्धतियों के संचित ज्ञान की विरासत के बल पर विश्व को एक स्वस्थ भविष्य देने के उद्देश्य से भारत सरकार ने पिछले एक दशक में अनेक कदम उठाए हैं। सभी नए AIIMS में आयुष विभाग की स्थापना की गई है। आयुष प्रोफेशनल्स की उपलब्धता बढ़ाने के लिए आयुष शिक्षण और प्रशिक्षण में अनेक सुधार किए गए हैं। लेह में स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोवा रिग्पा द्वारा सोवा-रिग्पा में चिकित्सा, शिक्षा और अनुसंधान को बढ़ावा दिया जा रहा है। आयुष के क्षेत्र में ease of doing business को बढ़ावा देने के लिए भी अनेक कदम उठाए गए हैं जिससे दवाओं के उत्पादन और निर्यात में MSMEs और Start-ups को बढ़ावा मिल रहा है। इस वर्ष के केंद्रीय बजट में आयुष क्षेत्र को और अधिक सशक्त बनाने के लिए तीन नए अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थानों की स्थापना, आयुष फार्मेसियों और औषधि परीक्षण प्रयोगशालाओं का उन्नयन तथा जामनगर स्थित WHO वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा केंद्र का उन्नयन जैसे महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं।
साक्ष्य-आधारित अनुसंधान, औषधियों के मानकीकरण और गुणवत्ता नियंत्रण जैसे कदमों से आयुष पद्धतियों की मान्यता एवं स्वीकार्यता और बढ़ेगी। मुझे प्रसन्नता है कि आयुष मंत्रालय इस दिशा में निरंतर प्रयासरत है। अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप अनुसंधान और दवाओं के विकास के लिए सामान्य दिशा-निर्देश बनाए गए हैं। आयुर्वेद, योग और अन्य आयुष पद्धतियों को आधुनिक स्वास्थ्य चुनौतियों के लिए भरोसेमंद, वैज्ञानिक समाधान के रूप में स्थापित करने के अनेक विज्ञान-सम्मत प्रयास हो रहे हैं।
आधुनिक वैज्ञानिक हस्तक्षेपों, नवाचारों और वैश्विक सहयोग के माध्यम से आयुष को और अधिक सरल, सुलभ एवं लोकप्रिय बनाकर हम इसे समकालीन स्वास्थ्य प्रणाली का अभिन्न अंग बनाने में सफल हो सकेंगे। मेरी शुभकामना है कि आप सब "सर्वे सन्तु निरामयाः" अर्थात सभी निरोग और स्वस्थ रहें की भावना के साथ आगे बढ़े और स्वस्थ भारत-सशक्त भारत के निर्माण में अपना योगदान दें।
धन्यवाद,
जय हिन्द!
जय भारत!
