भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का श्री जगन्नाथ मंदिर के भूमि पूजन समारोह में सम्बोधन(HINDI)

जमशेदपुर : 26.02.2026

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भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का  श्री जगन्नाथ मंदिर के भूमि पूजन समारोह में सम्बोधन(HINDI)

 महाप्रभु जगन्नाथ की कृपा से मुझे इस भूमि पूजन के शुभारंभ का अवसर मिला है। मैं महाप्रभु जगन्नाथ के चरणों में कोटि-कोटि नमन करती हूं। इस पावन अवसर से मुझे जोड़ने का माध्यम बनने के लिए मैं Shri Jagannath Spiritual and Cultural Charitable Centre Trust के पदाधिकारियों की हृदय से सराहना करती हूं।

महाप्रभु जगन्नाथ अखिल जगत के नाथ हैं। उनकी कृपा पूरी मानवता पर, बिना किसी भेदभाव के, समान रूप से बरसती है। महाप्रभु जगन्नाथ की कृपा सर्वजन सुलभ है, इस भाव को व्यक्त करने वाली एक अत्यंत सहज लोकोक्ति है:

जगन्नाथ का भात जगत पसारे हाथ मत पूछो जात-पात

देवियो और सज्जनो,

भगवान बिरसा मुंडा की धरती पर आकर महाप्रभु जगन्नाथ से जुड़े पवित्र कार्य का अवसर मिलने को मैं अपना परम सौभाग्य मानती हूं। झारखंड में आकर मेरी अनेक स्मृतियां जीवंत हो जाती हैं। राज्यपाल के रूप में यहां के लोगों की सेवा करने से जो आशीर्वाद मुझे मिला वह मेरी विशेष शक्ति है। कोल्हान का यह क्षेत्र जीवंत जनजातीय परम्पराओं के साथ देश की अन्य आध्यात्मिक परम्पराओं के संगम का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है। यहां के लोगों ने सदियों से चली आ रही परम्पराओं को संजोकर रखा है। यहां विभिन्न समुदायों के लोग मिल-जुलकर रहते हैं। यह सामाजिक सौहार्द महाप्रभु जगन्नाथ की भक्ति का प्रमुख आयाम है।

महाप्रभु जगन्नाथ के पुरी में स्थित परम पवित्र मंदिर के निर्माण की कथाओं में हमें विविध समुदायों के सम्मिलन के संदेश मिलते हैं। शबर नामक जनजातीय समुदाय के राजा विश्वावसु भगवान नील-माधव की नित्य उपासना किया करते थे। राजा इंद्रद्युम्न ने अपने मंत्री विद्यापति को राजा विश्वावसु के पास भेजा ताकि वे भगवान नील-माधव की प्रतिमा के विषय में जानकारी प्राप्त कर सकें। राजा विश्वावसु की पुत्री ललिता के सहयोग से विद्यापति ने भगवान नील-माधव की प्रतिमा के विषय में जानकारी प्राप्त कर ली। इस प्रकरण से जुड़े अनेक कथा-कथांतर विद्यमान हैं। ब्राह्मण जाति के विद्यापति और जनजातीय समुदाय के राजा विश्वावसु की पुत्री ललिता के बीच स्नेह उत्पन्न हुआ और दोनों का विवाह हुआ। राजा इंद्रद्युम्न ने महाप्रभु जगन्नाथ, बलभद्र तथा देवी सुभद्रा की प्रतिमाओं सहित महाप्रभु जगन्नाथ के पवित्र मंदिर का निर्माण किया। यह लोक- मान्यता समुदायों को परस्पर स्नेह के साथ रहने की तथा एक-दूसरे की अच्छी परम्पराओं को मिल-जुलकर अपनाने की प्रेरणा देती है। मुझे विश्वास है कि महाप्रभु जगन्नाथ का यहां निर्मित होने वाला मंदिर अध्यात्म और सामाजिक सौहार्द का एक प्रमुख केंद्र बनेगा। यहां भक्ति की विभिन्न धाराओं के लोग एक महाधारा में अवगाहन करेंगे।

महाप्रभु जगन्नाथ से जुड़े इस अवसर पर जगन्नाथ पुरी की रथ-यात्रा से जुड़ी अनेक स्मृतियों के चित्र मेरे मानस-पटल पर सजीव हो रहे हैं। रथ-यात्रा में जिस भावना के साथ अत्यंत विशाल जन-समूह की भागीदारी होती है, वह अद्भुत है तथा अतुलनीय है। यह पूरे मानव समाज के लिए हर्ष की बात है कि रथ-यात्रा का आयोजन देश-विदेश में अनेक स्थानों पर किया जाता है। साथ ही, देश-विदेश में अनेक स्थानों पर महाप्रभु जगन्नाथ के मंदिर स्थापित किए गए हैं और किए जा रहे हैं।

देवियो और सज्जनो,

विश्व में विभिन्न स्थानों पर हो रहे युद्ध एवं संघर्ष के कारण मेरे मन में चिंता और दुख होता है। साथ ही, महाप्रभु जगन्नाथ के प्रति बढ़ती हुई श्रद्धा को देखकर तथा भारतीय आध्यात्मिक परम्पराओं के प्रति विश्व- समुदाय में बढ़ते हुए सम्मान को देखकर मुझे संतोष होता है। लोगों में भक्ति और अध्यात्म के प्रति रुझान को देखकर यह विश्वास जागृत होता है कि महाप्रभु जगन्नाथ विश्व-समुदाय की रक्षा भी करेंगे और उसका कल्याण भी करेंगे।

पर्यावरण की सुरक्षा हमारी आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ी है। पेड़-पौधे, सागर- नदियां और चांद-सूरज की हम पूजा करते हैं। महाप्रभु जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा एवं चक्रराज सुदर्शन के विग्रह वृक्ष से ही बनते हैं। इससे हमें पेड़-पौधों का सम्मान करने की शिक्षा मिलती है। सुप्रसिद्ध स्वाधीनता सेनानी उत्कलमणि पंडित गोपबंधु दास ने लिखा है :

“भारतर प्रति वृक्ष कल्पवट प्रभु जगन्नाथ सर्वत्र प्रकट।”

अर्थात् भारत का हर वृक्ष कल्पवट है और प्रभु जगन्नाथ सर्वत्र विराजमान हैं।

मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि श्री जगन्नाथ ट्रस्ट द्वारा सामाजिक कल्याण के सर्व-समावेशी कार्य किए जाएंगे। इस सेवा-संकल्प के लिए मैं ट्रस्ट से जुड़े सभी लोगों की सराहना करती हूं। हमारी आध्यात्मिक चेतना में सभी जीव-जंतुओं तथा वनस्पतियों के प्रति स्नेह एवं करुणा की भावना पर सबसे अधिक जोर दिया गया है। साथ ही, परोपकार को सबसे बड़ा पुण्य माना गया है। मुझे यह जानकर विशेष प्रसन्नता हुई है कि अपेक्षाकृत कम सुविधा सम्पन्न वर्गों के बच्चों की शिक्षा के लिए आप लोग कार्य कर रहे हैं। ऐसे बच्चों के लिए छात्रावास की सुविधा उपलब्ध कराई गई है।

मैं चाहूंगी कि जो परिवार आर्थिक रूप से सम्पन्न नहीं हैं, ऐसे परिवारों के बच्चों की शिक्षा को आप सर्वोच्च प्राथमिकता दें। उनके लिए छात्रावास की सुविधा को बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराएं। मैंने आरंभिक शिक्षा के बाद, भुवनेश्वर में बालिका-छात्रावासों में रहकर, अपनी माध्यमिक और उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। ऐसी सुविधाओं के बिना शायद मेरी शिक्षा में रुकावट भी आ सकती थी। मुझे लगता है कि बालिका-छात्रावासों के निर्माण को विशेष प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

आपके ट्रस्ट द्वारा मुझे बताया गया है कि आप लोग श्रीमद्-भगवद्-गीता के अध्ययन के लिए एक residential learning program की व्यवस्था करने जा रहे हैं। यह एक अत्यंत सराहनीय संकल्प है। गीता के महत्व और उपयोगिता से जुड़ा एक सुभाषित है:

गीता सुगीता कर्तव्या, किमन्यै: शास्त्र-विस्तरै:।

इस सुभाषित का भावार्थ है कि गीता का अध्ययन बहुत अच्छी तरह करना चाहिए। गीता का ऐसा गहन अध्ययन करने के बाद अन्य शास्त्रों के विस्तार में जाने की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाती है।

मुझे विश्वास है कि कर्मयोग सहित आदर्श जीवन के सही मार्गों को दिखाने वाली श्रीमद्-भगवद्-गीता के प्रसार से जुड़े अपने संकल्प को आप सब शीघ्र ही कार्यरूप प्रदान करेंगे। ऐसा करके आप युवा पीढ़ी की आध्यात्मिक जागृति, चरित्र निर्माण तथा व्यक्तित्व के समग्र विकास में अमूल्य योगदान देंगे। यह आपके द्वारा राष्ट्र-निर्माण में योगदान सिद्ध होगा।

मुझे विश्वास है कि आप सबके प्रयासों के बल पर यहां स्थापित महाप्रभु जगन्नाथ का मंदिर आस्था, संस्कृति और सामुदायिक सेवा का सम्मानित केंद्र बनेगा। मैं महाप्रभु जगन्नाथ से प्रार्थना करती हूं कि आप सबके पवित्र संकल्प सिद्ध हों तथा इस क्षेत्र सहित हमारा देश समग्र प्रगति के लक्ष्यों को प्राप्त करे।

जय हिन्द!
जय भारत!
जय जगन्नाथ!

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