भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का संगीत नाटक अकादमी के ‘अकादमी रत्न’और ‘अकादमी पुरस्कार’ प्रदान करने के अवसर पर सम्बोधन (HINDI)

नई दिल्ली : 13.08.2026

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भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का  संगीत नाटक अकादमी के ‘अकादमी रत्न’और ‘अकादमी पुरस्कार’ प्रदान  करने के अवसर पर सम्बोधन (HINDI)

संगीत नाटक अकादमी पुरस्कारों से सम्मानित कलाकारों की इस सभा में उपस्थित होकर मुझे विशेष प्रसन्नता हो रही है। मैं सभी पुरस्कृत कलाकारों को हार्दिक बधाई देती हूँ। आज मेरे सामने आधुनिक भारत की प्रतिभा और साधना एक साथ उपस्थित हैं। भारतीय परंपरा के वाहक आप सब कलाकार हमारी सामूहिक स्मृति के संरक्षक हैं, और भविष्य की कल्पना के सर्जक भी।

प्रदर्शन कलाओं से जुड़े हुए जो कलाकार आज सम्मानित हुए हैं, वे मिलकर भारत का एक सांस्कृतिक मानचित्र प्रस्तुत करते हैं। ऐसा मानचित्र जिसमें  इस देश की मिट्टी से उपजी कथाएँ और गीत जुड़े हैं। विविधता से भरी इस धरती के नृत्य और उत्सव समाये हैं। इसकी भाषा-बोलियों की सदियों से बनती आ रही स्मृतियाँ बसी हुई हैं। 
हमारे संगीत की अनेक पद्धतियाँ हैं, नृत्य की अनेक शैलियाँ हैं और लोकनाट्य के असंख्य रूप हैं। आज यहाँ मंच पर आए विभिन्न कला से जुड़े 100 से अधिक कलाकार अपने पहनावे, चाल-ढाल और मुस्कान से अपनी-अपनी कला का परिचय दे रहे थे। भारत की संस्कृति जड़ों से जुड़ी हुई है। अलग-अलग खान-पान, वेषभूषा, नृत्य और संगीत, प्रकृति से प्रेरित हैं। चहकते हुए चिड़ियों से, कल-कल बहते झरनों से, पेड़-पौधों से, बादलों से, नदियों से प्रेरणा लेकर कलाकार अपने नृत्य और संगीत को प्रदर्शित करते हैं। विविधता और एकता का यह संबंध हमारी कलाओं की सबसे बड़ी शक्तियों में है।

देवियो और सज्जनो,

कला से जुड़े प्राचीन विद्वानों ने भारतीय नाट्य की बड़ी व्यापक परिभाषा की है। उनके अनुसार नाट्य जीवन का पर्याय ही है। जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे नाट्य अपने भीतर ग्रहण न कर सके और फिर व्यक्त न कर पाये। इसकी परिधि में आध्यात्मिक ज्ञान से लेकर शास्त्रीय विद्या तक, हस्तकौशल से लेकर संगीत और नृत्य तक तथा मनुष्य के विभिन्न कर्म और व्यवहार— सब समा जाते हैं। जो नाट्य में व्यक्त नहीं हो सका है, वह जीवन में भी नहीं हो सकता।

आज जब मैं आप सबको देख रही हूँ, तो मुझे केवल पुरस्कार विजेता ही नहीं दिखाई दे रहे हैं। मुझे भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा दिखाई दे रही है। आपके पीछे खड़े वे गुरु दिखाई दे रहे हैं जिन्होंने आपकी साधना को दिशा दी। वे परिवार दिखाई दे रहे हैं जिन्होंने आपके अभ्यास के लिए त्याग किया। और वे असंख्य श्रोता और दर्शक भी दिखाई दे रहे हैं जिनके प्रेम और सराहना ने आपकी कला को निरंतर ऊर्जा दी है। वास्तव में आज का यह सम्मान केवल व्यक्तियों का नहीं, हमारी पूरी सांस्कृतिक परंपरा और हमारे समाज की संवेदना का सम्मान है।

देवियो और सज्जनो,

भारत की विभिन्न कलाओं में गुरु-शिष्य संबंध की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हमारी कलाओं की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक जीवंत गुरु ही होते हैं। आज के तेजी से बदलते दौर में हमारी बहुत सी लोक-कलाओं पर विलुप्त होने का संकट मँडरा रहा है। ऐसी विधाओं का न केवल Documentation होना चाहिए, उनको जीवंत रखने के लिए विशेष प्रयास जरूरी हो जाते हैं।

मुझे बताया गया है कि अकादमी इसी उद्देश्य से कला-दीक्षा कार्यक्रम का आयोजन कर रही है। सभी वरिष्ठ कलाकारों अपनी अगली पीढ़ी तैयार करने के लिए योजनापूर्वक प्रयास करना ही चाहिए।

कला के संस्कार से जीवन को समृद्ध करने के लिए प्रकृति को सबसे सहज प्रशिक्षण संस्थान माना जाता है। कभी मरुभूमि ही गुरुकुल बन सकती है और पिता ही पहला गुरु। इस वर्ष के पद्म पुरस्कारों में राजस्थान के अलगोजा वादक श्री तगा राम भील को भी सम्मानित किया गया। उन्होंने सात वर्ष की उम्र में अपने पिता से और पशुओं को चराते हुए अलगोजा सीखना आरंभ किया था।

मैंने सदैव यह अनुभव किया है कि लोक और जनजातीय कलाओं में जीवन का स्वाभाविक उल्लास और प्रकृति के साथ गहरा संवाद दिखाई देता है। इन कलाओं में समुदाय की स्मृति और सामूहिक चेतना सहज रूप से व्यक्त होती है। यही कारण है कि लोक कलाएँ भारत की सांस्कृतिक पहचान का अत्यंत महत्त्वपूर्ण आधार हैं।
मैं स्वयं ऐसे परिवेश से आती हूँ जहाँ बहुत से गीत ऐसे होते हैं जो लिखे नहीं जाते, केवल गाये जाते हैं। बहुत सी ऐसी कथाएँ होती हैं जो पुस्तकों में नहीं मिलतीं, वे लोगों की स्मृति में रहती हैं। बहुत से नृत्य किसी मंच पर नहीं जन्म लेते, वे उत्सवों और आम जीवन के बीच जन्म लेते हैं।

देवियो और सज्जनो,

भारतीय संस्कृति के अनेक गंभीर अध्येताओं ने कला की व्यापक परिधि की बात की है। संगीत और चित्रकला से लेकर बुनाई, पाक-कला और अश्व-कला तक, अनेक दक्षताओं को कला के व्यापक संसार में स्थान मिला है। इस दृष्टि से कला जीवन से अलग कोई गतिविधि नहीं है।

मुझे बताया गया है कि आज के पुरस्कारों में उन कलाकारों को भी सम्मानित किया है, जो विदेशों में रहकर भारतीय कलाओं के प्रसार के लिए कार्यरत हैं। कलाकारों के साथ ही विविध कलाओं के मर्मज्ञ विद्वानों को भी पुरस्कृत करने की मैं सराहना करती हूँ।

देवियो और सज्जनो,

राष्ट्रपति के रूप में मुझे अनेक ऐतिहासिक अवसरों का साक्षी बनने का सौभाग्य मिलता है। कलाकारों के बीच आकर और उनसे प्रत्यक्ष संवाद करके भारत की आत्मा को उसके स्वाभाविक स्वर में देखना और सुनना मुझे विशेष अनुभव देता है। 
कला गुरुओं, कलाकारों और विभिन्न कलाओं के मर्मज्ञ विद्वानों की इस विशिष्ट सभा को शुभकामनाएँ देती हूँ। संगीत नाटक अकादमी को मैं भारत की Soft Power का महत्वपूर्ण केन्द्र मानती हूँ। मैं आशा करती हूँ कि अकादमी आने वाले समय में भी भारत की सांस्कृतिक ऊर्जा से समूचे विश्व को लाभान्वित करेगी। 
मैं आप सबके उज्वल भविष्य की मंगलकामना करती हूँ।

धन्यवाद!
जय हिन्द!!
जय भारत!!!

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