भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का महात्मा गांधी अंतर-राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में सम्बोधन(HINDI)

वर्धा : 16.04.2026

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आज उपाधि प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को मैं बधाई और आशीर्वाद देती हूं। पदक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की मैं विशेष सराहना करती हूं। विद्यार्थियों को मार्गदर्शन और प्रोत्साहन देने वाले आचार्यों और अभिभावकों को मैं साधुवाद देती हूं।

यह मेरा सौभाग्य है कि अपनी इस यात्रा के दौरान मुझे बापू के सेवाग्राम आश्रम का दर्शन करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। वर्ष 1936 से बापू उस आश्रम में रहने लगे थे और यह क्षेत्र हमारे स्वाधीनता संग्राम का प्रमुख केंद्र बन गया था। सेवाग्राम आश्रम में जाकर, बापू और कस्तूरबा की सादगी, आध्यात्मिकता, राष्ट्र-प्रेम और समाज-सेवा की शक्ति का गहन अनुभव होता है। राष्ट्रपिता की कर्मस्थली रही वर्धा की इस पवित्र भूमि से मैं सभी देशवासियों की ओर से बापू की पावन स्मृति को सादर नमन करती हूं। वर्धा में ही, वर्ष 1936 में, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और आचार्य काका कालेलकर के नेतृत्व में हिन्दी के प्रचार-प्रसार हेतु ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ की स्थापना की गई थी। यह उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी की भाषा गुजराती थी, नेताजी की भाषा बंगला थी और काका- साहब की भाषा मराठी थी।

इस विश्वविद्यालय का नाम राष्ट्रपिता के नाम पर रखा जाना सर्वथा इतिहास सम्मत है। इस विश्वविद्यालय से जुड़े सभी लोगों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के संवर्धन और विकास के लिए संकल्पबद्ध होकर कार्य करेंगे। मैं आशा करती हूं कि बापू के आदर्शों पर चलते हुए, आप सब इस विश्वविद्यालय के गौरव को निरंतर बढ़ाते रहेंगे।

अंतर-राष्ट्रीय विद्वत समुदाय ने भी हिन्दी के प्रति प्रचुर स्नेह और सम्मान अभिव्यक्त किया है और उसे कार्यरूप दिया है। बेल्जियम के फादर कामिल बुल्के का अंग्रेजी-हिन्दी कोश अत्यंत लोकप्रिय है तथा आधिकारिक शब्दकोश के रूप में प्रतिष्ठित है। मैं आशा करती हूं कि राष्ट्रीय और अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर अंतर-भाषा आदान-प्रदान को शक्ति देकर यह विश्वविद्यालय हिन्दी भाषा और साहित्य सहित अन्य भारतीय भाषाओं और अखिल भारतीय साहित्य को समृद्ध करेगा।

देवियो और सज्जनो,

भारत की आत्मा भारतीय भाषाओं में ही अभिव्यक्त होती है। विभिन्न भारतीय भाषाओं में संस्कृति, संवेदना और चेतना की एक ही भावधारा प्रवाहित होती है। इसीलिए, मैं या मेरी तरह अन्य ओड़िआ भाषी लोग, हिन्दी में रचित मुंशी प्रेमचंद की कहानियां अथवा महादेवी वर्मा की कविताएं ओड़िआ अनुवाद के माध्यम से पढ़ते हुए पूरी सहजता से उन रचनाओं के साथ जुड़ पाते हैं। इसी तरह हिन्दी भाषी पाठक, फकीर मोहन सेनापति, गोपीनाथ महान्ति और प्रतिभा राय जैसे ओड़िआ साहित्यकारों की रचनाओं के साथ जुड़ जाते हैं। बंगला मिश्रित संस्कृत में रचित हमारा राष्ट्रीय गीत ‘वन्दे मातरम्’ हम सभी देशवासियों की भावना को एक सूत्र में पिरोता है। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि इस विश्वविद्यालय में पूर्वोत्तर क्षेत्र के विद्यार्थियों सहित देश के अनेक राज्यों के विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। अंतर-भाषा संवाद की यह परंपरा हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं की उन्नति में सहायक होगी।

प्यारे विद्यार्थियो,

आप सबको अपने महान देश भारत की विरासत पर गर्व करना चाहिए। राष्ट्र-गौरव की इस भावना के साथ आपको दो राष्ट्रीय लक्ष्यों पर विशेष ध्यान देना है। ये लक्ष्य भारतीयता से जुड़े हैं, हमारी राष्ट्रीय पहचान से जुड़े हैं और देशवासियों की, विशेषकर आप जैसे युवाओं की, प्रतिभा और आत्म- विश्वास से जुड़े हैं। ये लक्ष्य हैं:

गुलामी की मानसिकता के अवशेषों को समाप्त करना

भारतीय ज्ञान परंपरा की पुनः प्रतिष्ठा करना

आप किसी भाषा का विरोध न करें, परंतु भारतीय भाषाओं के प्रति गर्व का अनुभव अवश्य करें। एक लोकप्रिय ओड़िआ कविता की एक पंक्ति का उल्लेख मैं प्रायः करती हूं। आज भी मैं उस पंक्ति का उल्लेख करना प्रासंगिक समझ रही हूं। वह पंक्ति है:

आऊ जेते भाषा पारूछ सिख निज मातृभाषा महत रख

अर्थात

और भी जितनी भाषाएं सीख सकते हो, सीखो! लेकिन अपनी भाषा का मान रखो।

सभी भारतीय भाषाएं हमारी अपनी भाषाएं हैं। प्रत्येक भारतवासी को अपनी स्थानीय भाषा के अलावा कम से कम एक अन्य भारतीय भाषा सीखनी चाहिए।

प्यारे विद्यार्थियो,

महात्मा गांधी के जीवन से अन्य शिक्षाओं के साथ-साथ भाषा संबंधी महत्वपूर्ण शिक्षा भी मिलती है। बापू ने लंदन में कानून की पढ़ाई की। उन्होंने लगभग दो दशकों तक दक्षिण अफ्रीका में वकालत और समाज सेवा का कार्य किया तथा वहां के समाज में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाया। इस प्रकार, इंग्लैंड से लेकर दक्षिण अफ्रीका तक के अपने लगभग 25 वर्षों के प्रवास के दौरान गांधीजी के कामकाज की तथा सामाजिक व्यवहार की भाषा अंग्रेजी थी। अंग्रेजी भाषा पर उनका असाधारण अधिकार था। परंतु स्वदेश लौटने के बाद जब उन्होंने स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व संभाला तब से उन्होंने निरंतर भारतीय भाषाओं में काम करने, लिखने-पढ़ने और बोलचाल को प्राथमिकता दी। अपनी पहली तथा सबसे चर्चित पुस्तक ‘हिन्द-स्वराज’, अपनी आत्मकथा और अधिकांश महत्वपूर्ण आलेख उन्होंने गुजराती में लिखे। उन्होंने हिन्दी के प्रचार-प्रसार पर बहुत बल दिया। उन्होंने अंग्रेजी भाषा का विरोध नहीं किया, परंतु भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता दी।

गांधीजी शिक्षा को आत्मनिर्भरता का आधार मानते थे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि जो शिक्षा अधिकांश देशवासियों के जीवन की आवश्यकताओं से जुड़ी है, वही सार्थक शिक्षा है। मुझे बताया गया है कि इस विश्वविद्यालय में ‘डॉक्टर आंबेडकर उत्कृष्टता केंद्र’ के माध्यम से वंचित वर्गों के विद्यार्थियों को विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए निशुल्क प्रशिक्षण सुविधा प्रदान की जा रही है। यह एक सराहनीय प्रयास है।

जो शिक्षा राष्ट्र हित में नहीं है उसे गांधीजी ने ‘अराष्ट्रीय शिक्षा’ की संज्ञा दी तथा उसकी आलोचना की। जनता की भावनाओं को समझने, जनसामान्य के जीवन में रुचि लेने तथा उनका पक्ष रखने की योग्यता होने को वे सार्थक शिक्षा का अंग मानते थे। इसी प्रकार, वे मानते थे कि सार्थक शिक्षा विद्यार्थियों को आडंबर, अहंकार, कृत्रिमता और संस्कारहीनता से दूर रखती है। महात्मा गांधी ज्ञान के व्यावहारिक उपयोग को पुस्तकीय ज्ञान से अधिक महत्व थे। मैंने गांधीजी के शिक्षा संबंधी विचारों का उल्लेख इसलिए किया है कि वे आज से लगभग सौ वर्ष पहले जितने प्रासंगिक थे उतने ही उपयोगी वे आज भी हैं।

प्यारे विद्यार्थियो,

हमारी अपनी भाषा ही सृजन की भाषा हो सकती है, अन्वेषण की भाषा हो सकती है, मौलिक चिंतन और आविष्कार की भाषा हो सकती है। हमें कृतियों का निर्माण करना है, अनुकृतियों का नहीं। हमें सशक्त, आत्मनिर्भर और विकसित भारत का निर्माण करना है। ऐसे भारत का निर्माण भारतीय भाषाओं की आधारशिला पर ही संभव है। इसलिए इस दिशा में हमें ध्यान देना है। ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ सहित अनेक प्रयासों के बल पर हमारा देश सही दिशा में अग्रसर है। मुझे विश्वास है कि महात्मा गांधी अंतर-राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के युवा विद्यार्थी व्यक्तिगत जीवन में प्रगति के साथ-साथ राष्ट्र-निर्माण में प्रचुर योगदान देंगे तथा विश्व पटल पर भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाएंगे और महात्मा गांधी के सपनों को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। आज gold medal प्राप्त करने वालों में बालिकाओं की संख्या ज्यादा थी। यह दृश्य केवल महात्मा गांधी अंतर-राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में ही नहीं है, यह भारत का दृश्य है। IIT, IIM, Central Universities, सभी जगह ये दृश्य देखकर मुझे प्रसन्नता होती है। जिस तरह महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आज़ादी के आंदोलन में भाग लिया था उसी प्रकार विकसित भारत बनाने में बेटा और बेटी दोनों को ही आगे आना होगा। मैं सभी विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हूं।

धन्यवाद!
जय हिन्द!
जय भारत!

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