भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का केन्द्रीय जनजातीय विश्‍वविद्यालय आंध्र प्रदेश के प्रथम दीक्षान्त समारोह में संबोधन (HINDI)

विजयनगरम : 30.06.2026

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आंध्र प्रदेश के इस ऐतिहासिक नगर में इस केन्द्रीय जनजातीय विश्‍वविद्यालय के प्रथम दीक्षान्त समारोह को संबोधित करते हुए मुझे प्रसन्नता हो रही है। आज उपाधियाँ प्राप्त करने वाले तथा उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए पदक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को मेरी शुभकामनाएँ और बधाई। वे सभी शिक्षक गण, अभिभावक गण भी बधाई के पात्र हैं जिन्होंने विद्यार्थियों का प्रोत्साहन और मार्गदर्शन किया।

मुझे बताया गया कि विश्‍वविद्यालय के इस प्रथम दीक्षांत समारोह में उपाधियाँ प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों में लगभग 46 प्रतिशत बेटियाँ हैं। हर्ष की बात यह भी है कि स्वर्ण पदक प्राप्त करने वालों में लगभग 70 प्रतिशत बेटियाँ हैं। महिला सशक्तीकरण के बढ़ते कदमों के साथ ही यह उपलब्धि संस्था की समावेशी सोच और Gender Justice के प्रति संवेदनशीलता को भी दर्शाती है।

इस जनजातीय विश्वविद्यालय पर अनेक विशेष जिम्मेदारियाँ हैं। यह अपेक्षा की जाती है कि यह विश्वविद्यालय जनजातीय समाज के आत्मविश्वास, नेतृत्व और नीति निर्माण का केन्द्र बने। सामाजिक न्याय के उद्देश्य से स्थापित की गयी ऐसी संस्थाओं का यह दायित्व भी होता है कि वे अपने क्षेत्र के जनजातीय समाज की शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास, आजीविका और वनाधिकारों के लिए जमीनी स्तर पर काम करें।

मुझे विश्वास है कि आने वाले वर्षों में इस विश्‍वविद्यालय द्वारा वंचित एवं जनजातीय समुदायों के युवाओं के सर्वांगीण विकास के साथ ही इस क्षेत्र के समग्र विकास के लिए भी सार्थक प्रयास किये जायेंगे।

देवियो और सज्जनो,

मुझे बताया गया है कि पिछले सात वर्षों से यह विश्‍वविद्यालय गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है। यहाँ के पाठ्यक्रमों में लचीलापन है और डिग्रियाँ कठोर सीमाओं में नहीं बँधी हैं। व्यावहारिक अनुभव पर बल देने के साथ ही विश्वविद्यालय के अनेक पाठ्यक्रमों में देशज और आधुनिकतम ज्ञान धाराओं का संतुलित समन्वय किया जा रहा है।

प्रिय विद्यार्थियो,

दीक्षान्त समारोह में मिलने वाली उपाधि प्रत्येक विद्यार्थी के जीवन का एक महत्वपूर्ण चरण है। आज आपके लिए खुशी मनाने का दिन है। लेकिन इसके साथ ही यह पल आपको अपने भविष्य के बारे में संकल्प लेने के लिए भी प्रेरित करता है। तेजी से बदलते हुए परिवेश में अपने आप को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए युवाओं को कौशल विकास के नये उभरते क्षितिजों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। मैं आशा करती हूँ कि विश्वविद्यालय ने आपको इस तरह से सक्षम बनाया होगा और नवाचारी सोच तथा आत्मविश्वास के बल पर आप सफलता की ओर बढ़ सकेंगे।

प्रिय विद्यार्थियो,

पुस्तकीय ज्ञान के साथ ही आप अपने परिवेश से भी सीखें और व्यावहारिक कौशल विकसित करें। यही सार्थक शिक्षा है। विद्यार्थियों को अपने समुदाय, संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रहते हुए समाज और देश के भविष्य को बेहतर बनाना है। हर विश्वविद्यालय में और विशेषकर, जनजातीय विश्वविद्यालय में, जनजातीय समाज की आजीविका संवर्धन के लिए ऐसी नवाचारी व्यवस्था होनी चाहिए जिसके आधार पर वन उपज, हस्त शिल्प, मिलेट, औषधीय पौधों, इको टूरिज्म और स्थानीय उद्यमिता पर उपयोगी कार्य हो सके।

तेजी से विकसित हो रहे भारत में अपनी विरासत से जुड़े रहने के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान के लाभ समाज के हर वर्ग तक ले जाने की आवश्यकता है। मुझे बताया गया है कि इसी उद्देश्य से विश्वविद्यालय द्वारा उत्तरी आंध्र प्रदेश के जनजातीय समुदाय के सशक्तीकरण के लिए Science and Technology Hub संचालित किया जा रहा है।

देवियो और सज्जनो,

मुझे ज्ञात हुआ है कि विश्‍वविद्यालय ने जनजातीय कल्याण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा और ऊर्जा संरक्षण पर अकादमिक और जमीनी कार्य करने पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। ये आयाम समता-मूलक विकसित भारत के निर्माण में अहम भूमिका निभाएँगे। विश्‍वविद्यालय ने जनजातीय कौशल विकास केंद्र स्थापित करके विविध क्षेत्रों में परियोजनाएँ संचालित की हैं और निकटवर्ती गाँवों को उनके समग्र विकास के लिए अपनाया है।

जनजातीय विश्वविद्यालयों से विशेष रूप से यह अपेक्षा भी की जाती है कि वे जनजातीय भाषा-बोलियों के संरक्षण पर मिशन मोड में काम करेंगे। मुझे बताया गया है कि आपकी संस्था के Tribal studies विभाग द्वारा कूई और सवारा समेत अनेक जनजातीय बोलियों के Documentation को लेकर इसी प्रकार से जमीनी कार्य किया जा रहा है।

मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि विश्‍वविद्यालय ने राज्य सैनिक बोर्ड के सहयोग से सशस्त्र बलों के कर्मियों, पूर्व सैनिकों तथा उनके आश्रितों के लिए एक रक्षा प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की है। यह पहल सराहनीय है। वर्ष 2047 तक “विकसित भारत” बनाने का हमारा लक्ष्य है। मुझे विश्वास है कि आंध्र प्रदेश का यह केन्द्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अपनी सार्थक, समावेशी और पर्यावरण-संरक्षण पर केन्द्रित व्यावहारिक शिक्षण पद्धति से इस लक्ष्य प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यहाँ के जनजातीय समाज की अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं और प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली है। मैं आशा करती हूँ कि समाज के इस वर्ग को आधुनिक शिक्षा के उपयोगी आयामों से जोड़कर यह विश्वविद्यालय देश के समतापरक विकास में यहाँ के युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका सुनिश्चित करेगा।

प्रिय विद्यार्थियो,

यह दीक्षांत समारोह आपमें एक विशेष उत्साह और उल्लास का संचार कर रहा है। इस विश्वविद्यालय से आपने जो अनुभव और कुशलता पाई है, उसके बल पर आप अपना भविष्य सँवारने के लिए आगे बढ़ेंगे। अपनी बेहतरी के साथ ही अपने समाज और देश के लिए भी आपको सक्रिय योगदान करना है — यह भाव आपके दिल-दिमाग से कभी ओझल नहीं होना चाहिए। आपको ऐसे भारत के निर्माण में सहायता करनी है, जहाँ विकास समतामूलक हो और कोई पीछे न छूटने पाए।

मैं अपने गांव की पहली स्नातक थी। आज के इस दीक्षांत समारोह में मेरे जैसे ही कुछ विद्यार्थी अपने परिवार के पहले स्नातक होंगे। हम जानते हैं कि घर की नींव मजबूत होनी चाहिए। अपने आप को आप इतना मजबूत बनाएं कि आप केवल अपने परिवार ही नहीं समाज का भी बोझ उठा सकें। मेरे पिताजी कहा करते थे जीवन में जो भी बनो, आगे तो बढ़ना ही है लेकिन पीछे मुड़ कर भी देखो। जिस संघर्ष से आप आगे बढ़ रहे हैं, इससे भी अधिक संघर्ष पीछे रह गए लोग कर रहे हैं। आपका कर्तव्य है समाज में पीछे रह गए लोगों को आगे लाना। इसी में आपकी शिक्षा की सार्थकता है। आप job seeker के बदले job provider बनें तभी आप समाज में पीछे रह गए लोगों को सहारा दे सकेंगे।

सरकार जनजातीय समुदाय को आगे बढ़ाने के लिए प्रयास कर रही है। सरकार के इन प्रयासों के बल पर आपको सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से मजबूत बनना होगा। समाज को आपसे बहुत उम्मीद है, आपको उन उम्मीदों पर खरा उतरना होगा।

इस सभागार में उपस्थित आप सभी विद्यार्थी हमारे भावी राष्ट्र निर्माता हैं। राष्ट्र निर्माण के यज्ञ में अपनी क्षमता भर योगदान करने का संकल्प आपमें अडिग बना रहे — इसी कामना के साथ मैं आपके उज्ज्वल भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ देती हूँ।

धन्यवाद,
जय हिन्द!
जय भारत!

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