भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का डॉक्टर श्री श्री शिवकुमार स्वामीजी के 119वें जन्मदिवस समारोह के अवसर पर सम्बोधन(HINDI)
सिद्धगंगा मठ - तुमाकुरु : 01.04.2026
(138.62 KB)श्री शिवकुमार स्वामीजी की जयंती और गुरुवंदना के शुभ अवसर पर यहां उपस्थित होकर मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है।
मैं मानती हूं कि श्री शिवकुमार स्वामीजी जैसे संत, हमारे समाज और राष्ट्र की आत्मा को स्वरूप प्रदान करते हैं। उनका भौतिक शरीर वर्ष 2019 में परम तत्व में विलीन हो गया परंतु उनकी अध्यात्म धारा, समाज का और देश का सदैव सिंचन-पोषण करती रहेगी। हमारी परंपरा में प्रार्थना है:
जीवेम शरद: शतम्, ... भूयश्च शरद: शतात् ।
अर्थात,
हम सौ वर्ष की आयु तक जीवित रहें, और सौ वर्ष से अधिक आयु तक भी जीवित रहें। इस प्रार्थना में केवल लंबी आयु की कामना नहीं की गई है। इस प्रार्थना में, व्यक्ति द्वारा पूर्णतः स्वस्थ, सक्रिय और आत्म-निर्भर बने रहने की कामना की गई है।
मुझे बताया गया है कि श्री शिवकुमार स्वामीजी ने शताब्दी जन्मसुख सम्पन्न करने के बाद कई वर्षों तक अपनी आध्यात्मिक सक्रियता से मानवता को समृद्ध किया। गरीबों और वंचितों की सेवा में समर्पित उनका जीवन कल्याण-कार्यों द्वारा अध्यात्म को व्यक्त करने का विलक्षण उदाहरण है।
देवियो और सज्जनो,
स्वामीजी के सत्कार्यों की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए मैं मठ से जुड़े सभी लोगों की प्रशंसा करती हूं। इस मठ द्वारा बड़ी संख्या में ग्रामीण बच्चों के लिए निशुल्क भोजन, आवास और शिक्षा की व्यवस्था करना अत्यंत सराहनीय कार्य है। मुझे यह जानकर विशेष प्रसन्नता हुई है कि primary school से लेकर engineering और management की उच्च शिक्षा की व्यवस्था मठ द्वारा की गई है। इसके लिए अनेक शिक्षण संस्थान स्थापित किए गए हैं। मुझे यह भी बताया गया है कि श्री शिवकुमार स्वामीजी के दिशा-निर्देश में स्थापित किए गए श्री सिद्ध-गंगा हॉस्पिटल द्वारा जन- सामान्य को उत्कृष्ट स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जाती हैं। इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि इस सिद्ध-गंगा मठ से अन्न-गंगा, करुणा-गंगा और शिक्षण-गंगा की अविरल धाराएं प्रवाहित होती हैं।
यह मठ सदियों से चली आ रही सेवा तथा अध्यात्म की परंपरा को आज के समय में आगे बढ़ा रहा है। हमारी परंपरा में विद्यादान को अत्यधिक महत्व दिया गया है। विद्या अथवा शिक्षा, व्यक्तित्व निर्माण और चरित्र निर्माण का आधार है। शिक्षा ही आत्म-निर्भरता का मार्ग प्रशस्त करती है। वंचित वर्गों के तथा ग्रामीण क्षेत्रों के कम सुविधा सम्पन्न विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करके आप सब समावेशी समाज के निर्माण में अमूल्य योगदान दे रहे हैं।
यह बहुत प्रसन्नता की बात है कि आप सबकी यह आध्यात्मिक संस्था प्रभु बसवन्ना के आदर्शों पर चल रही है। भेद-भाव रहित समाज-व्यवस्था तथा सबकी भागीदारी के आधार पर कार्य करने की लोकतान्त्रिक पद्धति का उदाहरण सदियों पहले प्रभु बसवन्ना ने प्रस्तुत किया था। सबके प्रति संवेदनशीलता के भाव को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था:
‘दयवे धर्मद मूल वय्या’
अर्थात,
‘करुणा ही सभी आस्थाओं का आधार है।’ प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में समस्त विश्व के लिए प्रेम और करुणा का भाव विद्यमान होना चाहिए।
प्रभु बसवन्ना ने कार्य करते हुए मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग अपनाया था और यही शिक्षा भी दी थी। उनका कथन है:
काय-कवे कैलास
अर्थात,
कार्य करने से ही कैलाश-पद यानी मोक्ष प्राप्त होता है। श्रीमद्भगवद् गीता में भी कामना-रहित रहते हुए निरंतर कर्म करते रहने की प्रेरणा दी गई है:
तस्मात् असक्त: सततम् कार्यम् कर्म समाचर।
अर्थात,
अनासक्त रहते हुए निरंतर भली-भांति कार्य करते रहो। कर्मठता, जन-सेवा और राष्ट्र-सेवा एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। अध्यात्म द्वारा जन-सेवा और राष्ट्र-सेवा को सुदृढ़ आधार प्राप्त होता है। कर्नाटका में जन- सेवा, राष्ट्र-सेवा, अध्यात्म एवं आधुनिक प्रगति के सबसे प्रभावशाली उदाहरण दिखाई देते हैं। इसके लिए कर्नाटका के कर्मठ और प्रतिभाशाली निवासी बधाई के पात्र हैं। कर्नाटका के लोग राष्ट्र-निर्माण में अग्रणी योगदान देते रहे हैं। मुझे विश्वास है कि कर्नाटका, राष्ट्र-निर्माण के अग्रणी केंद्र के रूप में आगे बढ़ता रहेगा।
देवियो और सज्जनो,
आज पूरे देश में राष्ट्रीय गीत ‘वन्दे मातरम्’ की रचना के 150 वर्ष सम्पन्न होने के उत्सव मनाए जा रहे हैं। इन उत्सवों के संदर्भ में कन्नड़ा साहित्य के माध्यम से देश के साहित्य को समृद्ध करने वाले राष्ट्र-कवि कुवेम्पु का मुझे सहज ही स्मरण हो जाता है। उनके द्वारा रचित कर्नाटका-गीत में भारत-माता की पुत्री के रूप में कर्नाटका-माता का वर्णन किया गया है। वह अमर गीत, “जय भारत जननीय तनुजाते, जय हे कर्नाटका माते”, सभी देशवासियों के हृदय में कर्नाटका के प्रति गौरव के साथ-साथ, राष्ट्रीय एकता की भावना जागृत करता है। इस गीत में भारतीय जीवन-मूल्यों की व्यापकता और उदारता का जीवंत चित्रण उपलब्ध होता है। यही भारतीय जीवन-मूल्य श्री शिवकुमार स्वामीजी के असाधारण योगदान में भी परिलक्षित होते हैं।
राष्ट्र-निर्माण, परोपकार और कर्तव्य-निष्ठा के मार्ग पर चलते हुए ही हम सब श्री शिवकुमार स्वामीजी की वास्तविक गुरुवंदना कर सकेंगे। उनकी पावन स्मृति से जुड़े इस समारोह में हम सब यह संकल्प लें कि ‘कर्नाटका- माते’ और ‘भारत-माता’ के गौरव को बढ़ाने के लिए हम सदैव सक्रिय रहेंगे।
धन्यवाद!
जय हिन्द!
जय भारत!
