भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की जयंती के अवसर पर आयोजित सामाजिक समरसता महोत्सव में संबोधन (HINDI)

गांधीनगर : 14.04.2026

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भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का  डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की जयंती के अवसर पर आयोजित सामाजिक  समरसता महोत्सव में संबोधन (HINDI)

बाबासाहब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की जयंती के शुभ अवसर पर मैं सभी देशवासियों की ओर से उनकी पावन स्मृति को सादर नमन करती हूं। आज मुझे उनके चित्र पर यहाँ लोक भवन में पुष्पांजलि अर्पित करने का सौभाग्य मिला। हमारे संविधान के निर्माण सहित, देश की आधुनिक प्रगति और सामाजिक न्याय के क्षेत्रों में बहुआयामी योगदान देने वाले बाबासाहब के प्रति कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करती हूं।

बाबासाहब, भगवान बुद्ध के उपदेश ‘भवतु सर्व मंगलम्’ का प्रायः उल्लेख किया करते थे। सबका कल्याण हो, यही भावना उनके प्रयासों में चरितार्थ होती थी। समतामूलक समाज व्यवस्था के प्रबल पक्षधर बाबासाहब ने ‘समता’ नाम के एक समाचार पत्र का प्रकाशन भी किया था। समस्त नागरिकों को ‘प्रतिष्ठा और अवसर की समता’ प्राप्त कराना हमारे संविधान का लक्ष्य है जो संविधान की प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है। संविधान में निहित अनेक समतामूलक प्रावधान समरस समाज के निर्माण को संवैधानिक आधार प्रदान करते हैं।

विधि-विशेषज्ञ, अर्थशास्त्री और समाज सुधारक के रूप में बाबासाहब के योगदान के विषय में विस्तार से चर्चा होती रही है। साथ ही, हमारी बैंकिंग प्रणाली, सिंचाई व्यवस्था, electricity system, labour management system तथा केंद्र एवं राज्यों के बीच revenue sharing system आदि क्षेत्रों में उनके कार्यों के विषय में विस्तृत जानकारी प्रसारित करने से हमारे देशवासी, राष्ट्र-निर्माता के रूप में उनके बहुआयामी योगदान को समग्रता के साथ समझ पाएंगे।

बाबासाहब एक प्रमुख संदेश दिया करते थे - ‘शिक्षित बनो’। क्योंकि शिक्षा ही विकास की कुंजी है। शिक्षा के मूल में देश का विकास है, समाज का विकास है। हमारे संविधान में शिक्षा को मौलिक अधिकार के रूप में स्‍थान दिया गया है। उच्‍च शिक्षण संस्‍थानों में वंचित वर्गो के विद्यार्थियों के हित में प्रावधान किये गये हैं। गांव-गांव में, नगर-नगर में शिक्षा प्राप्त करने के लिए वंचित वर्गों के लोगों को प्रोत्‍साहित करना हम सब का उत्‍तरदायित्‍व है। समग्र शिक्षा, विशेषकर नैतिक शिक्षा के बल पर समरसता का भाव सशक्त होता है। सभी वर्गों में, विशेषकर वंचित वर्गों में शिक्षा को सर्वोच्‍च प्राथमिकता देने से हमारे राष्‍ट्र-निर्माण के प्रयास और अधिक सशक्‍त होंगे।

शिक्षा की तरह शारीरिक स्‍वास्‍थ्‍य भी व्‍यक्ति, परिवार और समाज की प्रगति के लिए अनिवार्य है। हमारी प्रार्थना ‘सर्वे सन्‍तु निरामया:’ का भाव यह है कि सभी लोग रोगमुक्त रहें। जिसका शरीर स्वस्थ है वही रोगमुक्‍त रह सकता है। स्‍वास्‍थ्‍य के लिए, विशेषकर बच्‍चों के शरीर को स्‍वस्‍थ बनाने के लिए, समुचित पोषण और स्‍वच्‍छ पर्यावरण सहायक होते हैं। मुझे यह देखकर प्रसन्‍नता होती है कि पोषण और स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के क्षेत्र में केंद्र और राज्‍य सरकारों के द्वारा अनेक प्रयास किये जा रहे हैं। ग्रामीण स्‍तर पर स्‍वास्‍थ्‍य और चिकित्‍सा की आवश्‍यकताओं पर विशेष बल देकर हम स्‍वस्‍थ भारत सशक्‍त भारत और विकसित भारत के लक्ष्‍यों को प्राप्‍त कर सकेंगे।

देवियो और सज्जनो,

बाबासाहब ने कहा था कि भारत में एक गहरी सांस्कृतिक एकता है। उन्होंने भारतीय भावभूमि से उत्पन्न सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्यों को ही अपनाया था। भारतीय संस्कृति में विद्यमान सबके प्रति करुणा का भाव, सर्वोदय और समरसता एक-दूसरे के पूरक हैं। सबका कल्याण और सामाजिक एकता तथा सौहार्द एक-दूसरे पर आधारित हैं। जाति, वर्ग, भाषा और क्षेत्र जैसे सभी विभाजनों से ऊपर उठकर बिना किसी भेदभाव के एकजुट रहना समरसता का व्यावहारिक रूप है। भारत माता की सभी सन्तानें एक हैं, एकात्म हैं, एकरस हैं तथा समरस हैं। समरस भारतीय समाज के निर्माण का रास्ता समरस गांव से होकर जाता है। हम सब जानते हैं कि देश की आत्मा गाँव में है। गाँव में ज्यादा समरसता है। हालांकि, भिन्न-भिन्न जाति के लोग रहते हैं लेकिन उनके बीच परस्पर प्रेम, सद्भावना और स्नेह अभी भी बना हुआ है। भारत की संस्कृति गांवों में ही दिखाई देती है। भारत गांवों का देश है और गांवों का विकास होने से और ग्रामवासियों के समृद्ध होने से, देश का विकास आसानी से हो पाएगा। अभी हमने सामाजिक समरसता महोत्सव विषय पर जो short-film देखी उसमें समरस गांव की भावना को रेखांकित किया गया है। मैं धन्यवाद देना चाहती हूँ माननीय राज्यपाल महोदय को जिन्होंने इसको भली-भांति समझा। वे गाँव-गाँव गए। मेरी मां कहती थी कि तुम जो भी बनोगी हमेशा पीछे की तरफ देखोगी, तुम्हारे पीछे कितने लोग खड़े हैं। यदि तुम्हारे अंदर सामर्थ्य है तो उनके लिए कुछ करना। बड़ा बनना अच्छी बात है लेकिन बड़ा बनना तब सार्थक होगा जब तुम पीछे रहने वाले को आगे लाने के लिए तुम प्रयास करोगे। अपने सामर्थ्य के हिसाब से लोगों की मदद करने के लिए प्रयास करो, वह प्रयास अभी भी जारी है।

समरसता की भावना, हमारे देश के समग्र, समावेशी और समतामूलक विकास के लिए अनिवार्य है। इस संदर्भ में केंद्र सरकार, राज्य सरकार तथा अनेक संस्थाओं ने सराहनीय योगदान दिया है। गुजरात में समरसता युक्त समावेशी विकास के ऐसे अनेक प्रयासों को राज्यपाल आचार्य देवव्रत जी का मार्गदर्शन उपलब्ध हो रहा है और मुख्यमंत्री श्री भूपेन्द्रभाई पटेल जी के नेतृत्व में राज्य सरकार की सक्रिय सहायता मिल रही है। समरस समाज के निर्माण की दिशा में आप सबके योगदान की मैं हार्दिक प्रशंसा करती हूं।

सामाजिक समरसता के लिए वृक्षारोपण, स्वच्छता, पशुपालन विशेषकर गो- पालन, कृषि विकास और जन-कल्याण योजनाओं को जन-भागीदारी के माध्यम से आगे बढ़ाया जा रहा है। देश को आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। मेरे पिताजी कहा करते थे कि कोई बच्चों को तब तक चलाएगा, जब तक वह चलना न सीखे। जब चलना सीख जाए तो खुद दौड़ना चाहिए, आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। सरकार स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि – हरेक क्षेत्र में सहयोग दे रही है। सहयोग देना सरकार का कर्तव्य है लेकिन सहयोग का उपयोग करके बेहतर बनने के लिए खुद भी प्रयास करना चाहिए। सभी भाई- बहनों से अनुरोध करती हूं कि सरकार अपना काम कर रही है लेकिन आपको स्वयं भी आगे बढ़ने के लिए प्रयास करना चाहिए और आत्मनिर्भर बनना चाहिए।

मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि गुजरात में पशुपालक परिवारों को भलीभांति मार्गदर्शन दिया जाता है। यह तथ्य उल्लेखनीय है कि बाबासाहब जैसे संविधान निर्माताओं ने कृषि और पशुपालन के कार्यों को संवैधानिक महत्व दिया था जो हमारे संविधान के अनुच्छेद 48 में उल्लिखित है।

संविधान द्वारा गायों और बछड़ों तथा पशुओं की देखभाल करने का नीति- निर्देश हमारी प्राचीन परंपरा की संवैधानिक अभिव्यक्ति है।

आज केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, सहकारी संस्थाओं, अनेक उद्यमों तथा व्यक्तिगत प्रयासों के बल पर, दूध के उत्पादन में हमारा देश विश्व में प्रथम स्थान पर बना हुआ है। इस राष्ट्रीय सफलता में गुजरात में संचालित संस्थाओं और यहां के लोगों की अग्रणी भूमिका रही है।

इस संदर्भ में मुझे ओडिशा राज्य सरकार में ‘मत्स्य एवं पशु-संपद विकास मंत्री’ के अपने कार्यकाल का स्मरण हो रहा है। अपने सेवाकाल के दौरान ओडिशा में मैंने ‘गो-मित्र’ पद का सृजन किया था। इससे, गो-सेवा के लिए सुयोग्य मानव संसाधन को प्रोत्साहन मिला तथा स्व-रोजगार में वृद्धि हुई। ‘ओमफेड’ के नाम से प्रसिद्ध Odisha State Cooperative Milk Producers’ Federation के द्वारा दूध के उत्पादन को बढ़ाने के लिए भी मैंने यथा-संभव प्रयास किए थे। किसानों के पारस्परिक सहयोग और सहकारिता पर आधारित ऐसे सभी उद्यम सामाजिक समरसता को बढ़ावा देते हैं।

देवियो और सज्जनो,

सामाजिक समरसता के संदर्भ में, बाबासाहब आंबेडकर द्वारा संविधान सभा में दिए गए समापन भाषण का एक महत्वपूर्ण संदेश, सदैव प्रासंगिक रहेगा। बाबासाहब ने कहा था कि सामाजिक प्रजातन्त्र एक ऐसी जीवन पद्धति है जो स्वतन्त्रता, समानता और बंधुता को मूलभूत सिद्धांतों के रूप में अपनाती है। गाँव समृद्ध तो देश समृद्ध। किसी को भी शोषित और वंचित की मानसिकता के साथ नहीं जीना चाहिए। हम सभी देशवासी एक हैं। हम सब को मिलकर काम करना होगा।

धन्यवाद!
जय हिन्द!
जय भारत!

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