भारत की राष्ट्रपति, श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के स्मृति पर्व (राजाजी उत्सव) में सम्बोधन (HINDI)
नई दिल्ली : 23.02.2026
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भारत माता के महान सपूत, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जी के जीवन-वृत्त और विरासत के सम्मान में आयोजित इस उत्सव में आप सबके साथ शामिल होकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता हो रही है। आज मुझे राष्ट्रपति भवन में स्थापित की गई उनकी प्रतिमा का अनावरण करने का ऐतिहासिक अवसर मिला। मैं उनकी स्मृति को सादर नमन करती हूं। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को सम्मानित करके हमने भारत के आत्म-गौरव का सम्मान किया है। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को सम्मान और स्नेह से लोग राजाजी कहते थे। वे स्वाधीन भारत के पहले तथा एकमात्र भारतीय गवर्नर जनरल बने।
स्वाधीनता के बाद गवर्नर जनरल के निवास और कार्यालय को गवर्नमेंट हाउस का नाम दिया गया जो हमारे पहले गणतन्त्र दिवस के उपरांत राष्ट्रपति भवन बना।
गवर्नमेंट हाउस में राजाजी के आने के बाद इस भवन और परिसर की आत्मा बदल गई। राजाजी ने गवर्नमेंट हाउस के अपने कक्ष में रामकृष्ण परमहंस और महात्मा गांधी के चित्र लगाए। इस प्रकार उन्होंने भारत के अध्यात्म तथा सेवा की परंपरा को यहां सर्वोच्च स्थान दिया। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व करने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के चित्र से गवर्नमेंट हाउस के अपने कक्ष को सुशोभित करके राजाजी ने एक स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने यह अभिव्यक्त किया कि भले ही औपचारिक रूप से भारत तब तक उपनिवेश या Dominion था लेकिन स्वराज भारतवासियों के हृदय में पूर्णतः स्थापित हो चुका था। इस प्रकार, राजाजी ने गुलामी की मानसिकता से मुक्त होने का प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया था। भारत की विरासत पर गर्व करने और गुलामी की मानसिकता के अवशेषों को समाप्त करने का जो राष्ट्रीय अभियान देशवासियों ने अपनाया है उसमें राजाजी के आदर्श परिलक्षित होते हैं। भारत का शोषण करने वाले ब्रिटिश साम्राज्य के अधिकारियों के चित्र राष्ट्रपति भवन में लगे हुए थे। अब राष्ट्रपति भवन में भारतमाता के लिए सर्वस्व निछावर करने वाले परमवीर चक्र विजेताओं के चित्रों और वीरगाथाओं से सुसज्जित दीर्घा शोभायमान है। भारत की शास्त्रीय भाषाओं के ग्रंथों में संचित महान ज्ञान-परंपरा को संजोने वाली प्राचीन पांडुलिपियों से समृद्ध ग्रंथकुटीर की स्थापना राष्ट्रपति भवन में की गई है। ऐसे अनेक बदलाव राजाजी के चिंतन और जीवन के अनुरूप, भारतीयता पर गौरव की चेतना को आगे बढ़ाते हैं।
जब राजाजी गवर्नर जनरल बने तब उस समय के एक अत्यंत सम्मानित कार्टूनिस्ट शंकर ने अलंकृत वेषभूषा में राजाजी का स्केच बनाया जो बहुत प्रसारित हुआ। लेकिन राजाजी ने गवर्नर जनरल के रूप में भी अपने खादी के सामान्य वस्त्रों को ही अपनाए रखा। वे जीवन में सादगी और भारतीयता के पक्षधर थे। अपने खान-पान, रहन-सहन और विचारों से वे देशवासियों के लिए आदर्श प्रस्तुत करते थे।
वायसराय हाउस की एक संपत्ति देहारादून में थी जिसे अब राष्ट्रपति निकेतन के नाम से जाना जाता है। ब्रिटिश वायसराय और गवर्नर जनरल देहरादून में, जंगलों के बीच स्थित उस परिसर में, शिकार खेलने जाया करते थे।
राजाजी के आगमन के बाद देहरादून का वह स्थान शांतिपूर्वक विचार करने और राष्ट्रहित में कार्य करने का स्थल बन गया। अब देहरादून के उस परिसर में एक ‘राष्ट्रपति तपोवन’ की स्थापना की गई है जिसका नाम ही उसकी भारतीयता को तथा भारतीय लोकतन्त्र के जीवन-मूल्यों को स्पष्ट करता है। वहां एक राष्ट्रपति उद्यान भी विकसित किया जा रहा है जो जन- सामान्य के लिए खुला रहेगा।
विदेशी शासन के दौरान जनता से दूरी बनाए रखना ब्रिटिश शासकों की एक सोची-समझी पद्धति थी। हमारे अपने स्वाधीन देश में, हमारे अपने लोकतन्त्र में, जन-जन से जुड़ना हमारा सिद्धान्त है। मैं मानती हूं कि राष्ट्रपति भवन राष्ट्र का भवन है, सभी देशवासियों का भवन है। इस भवन के द्वार सभी देशवासियों के स्वागत के लिए खुले हैं। मुझे यह देखकर खुशी होती है कि राष्ट्रपति भवन तथा इससे जुड़े शिमला, हैदराबाद और देहरादून में स्थित परिसरों में सबका स्वागत होता है, वहां लोग घूमने आते हैं तथा भारतीय लोकतन्त्र की परम्पराओं से अवगत होते हैं। अब जो लोग राष्ट्रपति भवन देखने आएंगे उन्हें राजाजी के योगदान से परिचित कराया जाएगा। भारतीय चेतना और समस्त भारतवासियों, विशेषकर कमजोर वर्ग के लोगों से जुड़ाव राजाजी के विचारों और कार्यों में दिखाई देता है।
देवियो और सज्जनो,
भारत में हैदराबाद के विलय की प्रक्रिया में सरदार पटेल की प्रमुख भूमिका थी। उनके साथ, राजाजी ने भी विलय की उस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। हैदराबाद के भारत में विलय के पश्चात जिस परिसर में हमारा तिरंगा झण्डा लहराया गया वही परिसर बाद में भारत के राष्ट्रपति का प्रवास स्थल एवं कार्यालय बना। जाड़े के मौसम में कुछ समय के लिए राष्ट्रपति के वहां जाने की परंपरा विद्यमान है। जब भी मैं, किसी कार्य से, हैदराबाद में स्थित ‘राष्ट्रपति निलयम’ जाती हूं, तब मुझे राजाजी और सरदार पटेल की ऐतिहासिक भूमिका का स्मरण होता है। वहां स्थापित किए गए एक ऊंचे flag-post पर लहराता तिरंगा, राजाजी और सरदार पटेल के उच्च आदर्शों की याद दिलाता है।
देवियो और सज्जनो,
राजाजी ने गवर्नमेंट हाउस में 15 अगस्त 1948 को यानी स्वाधीनता की पहली वर्षगांठ के दिन एक स्वागत-समारोह का आयोजन किया। उस स्वागत- समारोह में राजाजी के नेतृत्व में किए गए नमक सत्याग्रह में भाग लेने वाले स्वाधीनता सेनानियों सहित अनेक स्वतंत्रता सेनानियों को निमंत्रित किया गया था। राष्ट्रहित में योगदान देने वाले देशवासियों को आमंत्रित करने की राजाजी द्वारा स्थापित की गई वह परंपरा राष्ट्रपति भवन में निरंतर जारी है।
ब्रिटिश शासन के दौरान हमारे देशवासियों को कई बार अकाल और दुर्भिक्ष की आपदा झेलनी पड़ी थी। स्वाधीनता के बाद के कालखंड में भी हमारे देशवासियों ने खाद्यान्न संकट का सामना किया। देशवासियों के लिए संवेदनशीलता की भावना से तथा किसानों को प्रेरित करने के लिए राष्ट्रपति भवन परिसर के एक हिस्से में राजाजी ने अनाज की खेती शुरू कराई। उन्होंने स्वयं भी हल चलाया और एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया।
Ladies and gentlemen,
Rajaji was gifted with multifaceted creativity and several dimensions. His contributions to the legal profession, freedom struggle, social and economic reforms, ancient Indian scriptures, Tamil and English writing, poetry and music, politics and governance greatly enriched them. He has left an indelible mark on the history of our great nation.
Our country’s emphasis on Swadeshi and Aatma-Nirbharata takes forward the idea of Swaraj as described by Rajaji. Building upon the ideas of Deshbandhu Chittaranjan Das, Rajaji had said and I quote:
“ ‘Swaraj’ was larger than ‘Independence’. Independence was ours as soon as the British retired, but ‘Swaraj’ can only be attained by hard work”.
As we move ahead towards making ‘Viksit Bharat’ by 2047, icons like Rajaji inspire us with their ideas and ideals. Let us resolve to promote the spirit of enterprise to fulfil the dreams of Rajaji. Let us also resolve to adhere to the enduring ideals of our ancient traditions and values so beautifully written and popularised by Rajaji.
मैं यह मानती हूं कि राजाजी के आदर्शों पर चलना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। मैं आशा करती हूं कि सभी देशवासी राजाजी के व्यक्तित्व और कृतित्व से प्रेरणा लेकर ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना के साथ आगे बढ़ते रहेंगे।
धन्यवाद!
जय हिन्द!
जय भारत!
