भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का अध्यात्मिक जागृति द्वारा आदिवासी समाज का सशक्तीकरण महा सम्मेलन में सम्बोधन (HINDI)

बैतूल : 18.06.2026

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भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का  अध्यात्मिक जागृति द्वारा आदिवासी समाज का सशक्तीकरण महा सम्मेलन में  सम्बोधन (HINDI)

 जनजातीय समुदाय के सशक्तीकरण के लक्ष्य पर केन्द्रित इस महा- सम्मेलन में उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। मैं ब्रह्माकुमारी संस्था को इस महत्वपूर्ण पहल के लिए हार्दिक बधाई देती हूँ।

 

आपके संस्थान ने जो पहल की है, उसका इस क्षेत्र के लिए ही नहीं, हमारे पूरे देश और सम्पूर्ण समाज के लिए विशेष महत्व है। मुझे विश्वास है कि इस महा सम्मेलन में भविष्य के लिए ऐसी समग्र कार्य-योजना बनेगी जो देश के जनजातीय समाज को राष्ट्रीय प्रगति के प्रमुख भागीदार के रूप में सशक्त करने में सहायक होगी।

स्वामी विवेकानंद, महर्षि ओरबिंदो सहित अनेक आधुनिक भारतीय ऋषियों-समाज सुधारकों ने कहा है, भारत समूचे विश्व को मानवीय और प्रकृति पोषक सर्वांगीण विकास की राह दिखा सकता है। इस दृष्टि से ब्रह्माकुमारी संस्थान के प्रयास उपयोगी और प्रेरक रहे हैं। संस्थान ने मातृ शक्ति को केन्द्र में रखकर अपने कार्यक्रमों और योजनाओं को आगे बढ़ाया है। इस कारण संस्था के विभिन्न प्रकल्पों में एक समग्र आंतरिक शुचिता है। यह शुचिता कार्यजगत में मानवीय गरिमा और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता के रूप में हमेशा विद्यमान रहती है।

उपभोग की संस्कृति पर आधारित आज की तेज भागती दुनिया में समाज के हर वर्ग की आध्यात्मिक शुचिता बहुत महत्वपूर्ण हो गयी है। इसी के बल पर दीर्घकालिक रूप से समता-परक आचरण-पद्धति और प्राकृतिक संपदाओं के प्रति संवेदनशील जीवन-शैली विकसित की जा सकती है। आज के तनाव और युद्ध से त्रस्त विश्व में इसकी आवश्यकता अतीत के किसी भी काल-खंड की तुलना में और अधिक हो गयी है। इसलिये इस सम्मेलन तथा ऐसे प्रयासों का महत्व और भी बढ़ जाता है।

जनजातीय समुदाय की जीवनशैली सहज रूप से ही अध्यात्म की मूलभूत प्रेरणाओं के निकट होती है। आदिवासी समाज की जीवन-शैली आध्यात्मिकता से भरी हुई है। वे शांति से जीना जानते हैं, हिंसा से दूर रहते हैं। वे गीली मिट्टी की तरह हैं। उन्हें जैसे भी ढाला जाए, वैसे ढल जाते हैं। वे प्रकृति की पूजा करते हैं। वे धरती, आकाश, वायु, जल, सूर्य और चन्द्र की भी पूजा करते हैं। वे धरती को क्षति नहीं पहुंचाते हैं, जल को दूषित नहीं करते हैं, नदी-तालाबों में कूड़ा नहीं फेंकते हैं, धरती को अगर जरूरत अनुसार चोट पहुंचाते हैं तो पहले उसको नमन करते हैं। पेड़-पौधों की पूजा करते हैं। खाना बनाने के लिए सूखी हुई लकड़ी चुनते हैं। अगर पेड़ काटना पड़े तो पहले उसको नमन करते हैं। पेड़-पौधों, सूरज और नदियों से ही जीवन है। कई आदिवासी समाज के लोग पेड़-पौधों को अपना पूर्वज मानते हैं।

हम inclusivity में विश्वास करते हैं इसलिए आदिवासी समाज को आधुनिकता के साथ जोड़ने का प्रयास करना चाहिए। पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी कहते थे कि यह देश कोई जमीन का टुकड़ा नहीं है, यह जीता-जागता राष्ट्र पुरुष है। राष्ट्र पुरुष का प्रत्येक अंग हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक अक्षत होना चाहिए। भारत में रहने वाला कोई भी नागरिक या समाज पीछे न रह जाए। तभी हम भारत को विकसित कह सकते हैं। आदिवासी समाज को जागरूक करने के लिए ब्रह्म कुमारी संस्थान जो प्रयास कर रही है, उसके लिए मैं इस संस्थान को बहुत-बहुत बधाई देती हूँ। साथ ही, राज्य सरकार को भी आदिवासी समाज के लिए बहुत सी योजनाएं लागू करने के लिए बधाई देती हूँ।

आदिवासी भाई-बहन प्राकृतिक खेती बहुत ही अच्छी करते हैं। प्राकृतिक खेती शरीर, मन और आध्यात्मिकता सभी के लिए अच्छी होती है। प्राकृतिक सम्पदाओं से जुड़ाव आदिवासी समाज की वह सहज शक्ति है जो सर्व-मंगलकारी सोच और कार्यनीति को जीवन के हर आयाम में सामने लाती है। यह बहुत संतोष की बात है कि इस दृष्टि से आपका यह संस्थान जनजातीय समाज के साथ मिलकर लंबे समय से अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य देश के अनेक हिस्सों में कर रहा है।

भारतीय जीवन दृष्टि के अनुसार कार्यरत प्रत्येक संस्था को इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिए कि समाज के किसी भी वर्ग का सशक्तीकरण केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं हो सकता। वास्तविक सशक्तीकरण तब होता है जब व्यक्ति आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और जागरूकता के बल पर सामाजिक दायित्वबोध के साथ अपने कार्यक्षेत्र में सक्रिय होता है। आदिवासी समाज के लोग आत्मसम्मान के साथ जीते हैं। वे अपनी समस्या साझा करना पसंद नहीं करते हैं। वे मांगते नहीं हैं। आध्यात्मिक जागृति व्यक्ति को उसकी आंतरिक शक्तियों का अनुभव कराती है और साथ ही, उसे सकारात्मक सोच और जीवन के उच्च उद्देश्यों से जोड़ती है।

देवियो और सज्जनो,

तेजी से बदलती दुनिया में आधुनिक तकनीक का महत्व लगातार बढ़ता जा रहा है। इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि जनजातीय युवाओं को आधुनिक शिक्षा, कौशल विकास और डिजिटल सशक्तीकरण से जोड़ा जाय और साथ ही उनकी सांस्कृतिक पहचान और आध्यात्मिक विरासत को भी सुरक्षित रखा जाय। विकास और संस्कृति, दोनों का संतुलन ही एक सशक्त एवं समृद्ध समाज का आधार है। सार्थक विकास वह है जो हमारी जड़ों और जीवन मूल्यों से पोषण भी ग्रहण करे तथा उन जड़ों को मजबूत भी बनाए। हम जब ऐसी समग्र दृष्टि से काम करेंगे तभी समाज में समसरता और समता की प्रबल धारा प्रवाहित होगी। तभी हम समावेशी विकास के नए प्रतिमान स्थापित कर सकेंगे।

मुझे बताया गया है कि ब्रह्माकुमारी संस्थान ने इस क्षेत्र में पिछले अनेक दशकों से अथक परिश्रम किया है। संस्थान ने बैतूल एवं आसपास के जनजातीय क्षेत्रों में आध्यात्मिक जागृति, नैतिक मूल्यों के प्रसार, नशामुक्ति, महिला सशक्तीकरण, युवा विकास तथा सामाजिक उत्थान के लिए निरंतर कार्य किया है। संस्था ने जनजातीय भाई-बहनों में आत्मविश्वास और सकारात्मक जीवन दृष्टि विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ध्यान एवं आध्यात्मिक शिक्षा के माध्यम से अनेक लोगों के जीवन में शांति, संतुलन और नई आशा का संचार हुआ है।

मध्य प्रदेश का यह बैतूल जिला अपनी समृद्ध जनजातीय संस्कृति, प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक विरासत के लिए पूरे देश में जाना जाता है। मुझे बताया गया है कि यहाँ के जनजातीय समुदायों ने अपनी विशिष्ट परंपराओं, लोक ज्ञान और सांस्कृतिक मूल्यों को पीढ़ी-दर- पीढ़ी संरक्षित रखा है।

बैतूल की जनजातीय संस्कृति में सामूहिकता, सहयोग, सरलता, ईमानदारी और आध्यात्मिकता जैसे उच्च जीवन-मूल्य सहज रूप में विद्यमान हैं। जब अध्यात्म और सेवा का संगम होता है, तब समाज में स्थायी परिवर्तन आता है। मुझे विश्वास है कि यह महा-सम्मेलन सेवा और अध्यात्म के इस संगम की ओर लोगों को आकृष्ट करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास सिद्ध होगा।

आइए, हम सभी मिलकर 2047 तक एक ऐसे विकसित भारत के निर्माण के लिए अधिक प्रतिबद्धता के साथ कार्य करें जहाँ अध्यात्म, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण और मानव-कल्याण हमारे समावेशी विकास की आधारशिला बनें।

मैं एक बार फिर इस आयोजन के लिए अपनी हार्दिक बधाई देती हूँ तथा सभी प्रतिभागियों को उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं देती हूँ।

धन्यवाद!
जय हिन्द!
जय भारत!

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