भारत की राष्ट्रपति ने राष्ट्रपति भवन में ग्रंथ कुटीर का उद्घाटन किया

भारत की 11 शास्त्रीय भाषाओं के ग्रन्थ कुटीर में लगभग 2,300 पुस्तकों का संग्रह है

शास्त्रीय भाषाओं में संचित ज्ञान का भंडार हमें अपने समृद्ध अतीत से सीख लेकर उज्ज्वल भविष्य के निर्माण के प्रति प्रेरित करता है: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु

राष्ट्रपति भवन : 23.01.2026

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भारत की राष्ट्रपति, श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज 23 जनवरी, 2026 को राष्ट्रपति भवन में ग्रंथ कुटीर का उद्घाटन किया। ग्रंथ कुटीर में भारत की 11 शास्त्रीय भाषाओं - तमिल, संस्कृत, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, ओडिया, मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली - की पांडुलिपियों और पुस्तकों का समृद्ध संग्रह है।

ग्रन्थ कुटीर भारत की समृद्ध और विविध सांस्कृतिक, दार्शनिक, साहित्यिक और बौद्धिक विरासत को प्रदर्शित करता है। इस कुटीर में भारत की 11 शास्त्रीय भाषाओं में लगभग 2,300 पुस्तकों का संग्रह है। भारत सरकार ने 3 अक्तूबर, 2024 को मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली भाषाओं को 'शास्त्रीय भाषा' का दर्जा दिया था। इससे पहले, छह भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त था। ग्रंथ कुटीर संग्रह में महाकाव्य, दर्शन, भाषाविज्ञान, इतिहास, शासन, विज्ञान और भक्ति साहित्य जैसे अनेक विषयों के साथ-साथ इन भाषाओं में भारत का संविधान भी शामिल है। इस संग्रह में लगभग 50 पांडुलिपियाँ भी हैं। इनमें से अनेक पांडुलिपियाँ ताड़ के पत्ते, कागज, छाल और कपड़े जैसी पारंपरिक सामग्रियों पर हाथ से लिखी गई हैं।

ग्रन्थ कुटीर का विकास केंद्र सरकार, राज्य सरकार, विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों, सांस्कृतिक संगठनों और देश के व्यक्तिगत दानदाताओं के सहयोग से किया गया है। शिक्षा मंत्रालय और संस्कृति मंत्रालय तथा उनसे संबद्ध संस्थानों ने इस पहल का समर्थन किया है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र पांडुलिपियों के प्रबंधन, संरक्षण, प्रलेखन और प्रदर्शन में पेशेवर विशेषज्ञता प्रदान कर रहा है।

ग्रन्थ कुटीर के विकास का उद्देश्य भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत के प्रति नागरिकों में जागरूकता को और बढ़ाना है। औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेषों को मिटाने के राष्ट्रीय संकल्प के अनुरूप ग्रंथ कुटीर का विकास प्रमुख कृतियों के माध्यम से समृद्ध विरासत को दिखाने और विविधता में एकता की भावना को बढ़ावा देने के लिए किया गया है। ग्रंथ कुटीर, ज्ञान भारतम मिशन की परिकल्पना को साकार करने का एक प्रयास है। ज्ञान भारतम मिशन एक राष्ट्रीय पहल है जिसका उद्देश्य भारत की विशाल पांडुलिपि विरासत को संरक्षित करना, उसका डिजिटलीकरण करना और भावी पीढ़ियों के लिए परंपरा और प्रौद्योगिकी को जोड़कर उसका प्रसार करना है।

पहले यहाँ विलियम होगार्थ की मूल कृतियों की सूची, लॉर्ड कर्ज़न ऑफ़ केडलस्टन के भाषण, लॉर्ड कर्ज़न ऑफ़ केडलस्टन के प्रशासन का सार, लॉर्ड कर्ज़न का जीवन से जुड़ा कार्य, पंच पत्रिकाएँ और अन्य पुस्तकें होती थीं। इन्हें अब राष्ट्रपति भवन संपदा में ही एक अलग स्थान पर स्थानांतरित कर दिया गया है। ये पुस्तकें अभिलेखीय संग्रह का भाग हैं और इनका डिजिटलीकरण कर दिया गया है और शोधार्थियों के लिए यह ऑनलाइन उपलब्ध कराई जाएंगी।

राष्ट्रपति भवन सर्किट 1 के मार्गदर्शित भ्रमण के दौरान आगंतुक इन कृतियों और पांडुलिपियों की झलक देख सकेंगे। साथ ही लोग इस संग्रह की जानकारी प्राप्त कर सकेंगे और उपलब्ध पुस्तकों और पांडुलिपियों को पढ़ सकेंगे, यह संग्रह ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से भी उपलब्ध रहेगा। शोधकर्ता ग्रंथ कुटीर में व्यक्तिगत रूप से आने के लिए पोर्टल के माध्यम से आवेदन भी कर सकते हैं।

इन भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिलाने वाले कुछ प्राचीन ग्रंथ हैं: संस्कृत में वेद, पुराण और उपनिषद; मराठी भाषा में सबसे प्राचीन ज्ञात साहित्यिक कृति गाथासप्तसती; पाली भाषा में बौद्ध भिक्षुओं के लिए मठवासी नियमों का वर्णन करने वाला विनय पिटक; जैन अगम और प्राकृत शिलालेख जो महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अभिलेख हैं; असमिया, बंगाली और ओडिया में प्राचीन बौद्ध तांत्रिक ग्रंथ चर्यापद; जीवन के विभिन्न पहलुओं पर तमिल भाषा का प्राचीन ग्रंथ तिरुक्कुरल; तेलुगु में महाभारत; कन्नड़ में अलंकारशास्त्र, काव्यशास्त्र और व्याकरण पर उपलब्ध सबसे प्राचीन कृति कविराजमार्ग और मलयालम में रामचरितम।

कुटीर के उद्घाटन के बाद सभा को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि शास्त्रीय भाषाओं ने भारतीय संस्कृति को आधार प्रदान किया है। विज्ञान, योग, आयुर्वेद और भारत की शास्त्रीय भाषाओं में रचित साहित्य का ज्ञान सदियों से विश्व का मार्गदर्शन करता रहा है। तिरुक्कुरल और अर्थशास्त्र जैसे ग्रंथ आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं। गणित, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद और व्याकरण जैसे विषयों का विकास इन भाषाओं के माध्यम से हुआ है। पाणिनि का व्याकरण, आर्यभट का गणित और चरक-सुश्रुत का चिकित्सा विज्ञान आज भी विश्व को आश्चर्य- चकित करते हैं। आधुनिक भारतीय भाषाओं के विकास में भी शास्त्रीय भाषाओं का महत्वपूर्ण योगदान है। इन भाषाओं के योगदान का सम्मान करने और इनके संरक्षण एवं विकास को बढ़ावा देने के लिए इन्हें शास्त्रीय भाषाओं का विशेष दर्जा दिया गया है।

राष्ट्रपति ने कहा कि शास्त्रीय भाषाओं में संचित ज्ञान का भंडार हमें अपने समृद्ध अतीत से सीख लेकर उज्ज्वल भविष्य के निर्माण के लिए प्रेरित करता है। विरासत और विकास के इस समन्वय का हमारा मूल-मंत्र भी शास्त्रीय भाषाओं के महत्व को रेखांकित करता है।

राष्ट्रपति ने कहा कि सभी कर्तव्यनिष्ठ लोगों की ज़िम्मेदारी है कि हमारी भाषाओं की विरासत का संरक्षण और संवर्धन करें। विश्वविद्यालयों में शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन को बढ़ावा देना, युवाओं को कम से कम एक शास्त्रीय भाषा सीखने के लिए प्रेरित करना और पुस्तकालयों में इन भाषाओं में अधिक से अधिक पुस्तकें उपलब्ध कराना इन भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है।

राष्ट्रपति ने कहा कि यह ग्रंथ कुटीर भारत की शास्त्रीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में राष्ट्रपति भवन की ओर से किया जा रहा सामूहिक प्रयास है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस कुटीर में शास्त्रीय भाषाओं से संबंधित सामग्री का संग्रह निरंतर बढ़ता रहेगा। उन्होंने यह भी विश्वास जताया कि इस कुटीर के संग्रह सें सभी आगंतुक, विशेषकर हमारे युवा शास्त्रीय भाषाओं के बारे में जानने और समझने के लिए प्रेरित होंगे।

इस अवसर पर अन्य गणमान्य व्यक्तियों के साथ संस्कृति राज्य मंत्री श्री राव इंद्रजीत सिंह, शिक्षा राज्य मंत्री श्री जयंत चौधरी, विषय विशेषज्ञ, दानदाता और राज्य प्रतिनिधि उपस्थित थे।

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